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Editorial | 2016-05-17
परेशान करती आर्थिक सुस्ती



(गुमनाम)


संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का खामियाजा आज देश भुगत रहा है। 2009 के चुनाव के पूर्व संप्रग सरकार ने मनरेगा की शुरुआत की और किसानों के ऋण माफ किए। इन दोनों कदमों से आम आदमी को सुकून मिला, जिसका फल संप्रग को दोबारा सत्ता में काबिज होने के रूप में मिला। लेकिन इन कदमों से देश का दीर्घकालीन आर्थिक विकास प्रभावित हुआ। सरकारी बजट से किया गया यह खर्च पूर्ण रूप से गरीब की खपत बढ़ाने में व्यय हुआ। साथ-साथ संप्रग सरकार ने भ्रष्टाचार के माध्यम से सरकारी बजट में चौतरफा रिसाव कराया। इन दोनों मदों पर सरकारी राजस्व के खर्च होने से हाईवे, डिजिटल गवर्नेस, राफेल फाइटर एयरक्राफ्ट जैसे जरूरी निवेश लटक गए। फलस्वरूप देश की आर्थिक विकास दर दबाव में आ गई। 1नोट छापकर खपत करने से महंगाई और मंदी की दोहरी मार में अर्थव्यवस्था फंस जाती है। सामान्य परिस्थिति में सरकार द्वारा नोट छापकर निवेश करने से महंगाई बढ़ती है, परंतु साथ-साथ विकास दर भी बढ़ती है। मान लीजिए सरकार ने 100 करोड़ रुपये के अतिरिक्त नोट छापे और इनका खर्च हाईवे बनाने में किया। नोट छापने से अर्थव्यवस्था में प्रचलन में आ रही मुद्रा की मात्र बढ़ी। इससे महंगाई बढ़ेगी, जैसे शादी के सीजन में सब्जी मंडी में दाम बढ़ने लगते हैं, क्योंकि नए खरीदार नोटों की गड्डी लेकर उपस्थित हो जाते हैं। दूसरी तरफ हाईवे बनने से अर्थव्यवस्था में ग्रोथ होती है। माल की ढुलाई का खर्च कम बैठता है। इस प्रकार महंगाई और ग्रोथ साथ-साथ चलते हैं। लेकिन छापे गए नोट का उपयोग यदि खपत अथवा रिसाव के लिए किया जाए तो प्रभाव पलट जाता है। नए नोटों के प्रचलन में आने से महंगाई पूर्ववत बढ़ती है। लेकिन इस रकम का उपयोग खपत बढ़ाने अथवा विदेश भेज दिए जाने से ग्रोथ नहीं बढ़ती है। फलस्वरूप अर्थव्यवस्था महंगाई तथा मंदी के दोहरे संकट में पड़ती है। इसे ‘स्टैगफ्लेशन’ कहा जाता है-यानी स्टैगनेशन के साथ इनफ्लेशन। संप्रग सरकार की मेहरबानी से देश स्टैगफ्लेशन में उलझ गया था। महंगाई तेजी से बढ़ रही थी, परंतु विकास दर न्यून बनी हुई थी। जैसे मासिक तन्ख्वाह का उपयोग टीवी खरीदने अथवा फाइव स्टार होटल में ऐशो आराम करने के लिए किया जाए तो बच्चों को दूध घी नहीं मिलता है और परिवार मंद पड़ जाता है। 1इस दुरूह परिस्थिति को राजग सरकार ने विरासत के रूप में पाया। राजग सरकार ने सर्वप्रथम भ्रष्टाचार एवं रिसाव बंद किए। एक जानकार व्यक्ति ने बताया कि केंद्रीय मंत्री सरकारी आयोजनों में 500 रुपये प्रति प्लेट की महंगी भोजन व्यवस्था करने में घबरा रहे हैं। उनके द्वारा निर्देश दिया जाता है कि 100 रुपये प्रति प्लेट की व्यवस्था की जाए। सरकारी राजस्व के दुरुपयोग को रोकने की यह मुहिम स्वागत योग्य है। इससे नोट छापना कम हुआ है और महंगाई नियंत्रण में आई है, लेकिन ग्रोथ भी सपाट बनी हुई है, क्योंकि हाईवे बनाने में खर्च नहीं किया जा रहा है। पूर्व में ऋण लेकर उसका उपयोग होटलबाजी में किया जा रहा था। अब ऋण लेना बंद कर दिया गया है और होटलबाजी भी। अर्थव्यवस्था में सामान्य स्थिति बनी हुई है। महंगाई नियंत्रण में है, परंतु ग्रोथ ढीली है। 1बताते चलें कि सरकार द्वारा सात प्रतिशत विकास दर का दावा खोखला है। अर्थव्यवस्था के तमाम दूसरे आंकड़े जैसे रोजगार, बैंकों द्वारा दिए गए ऋण आदि इस सुनहरे दृश्य से मेल नहीं खाते हैं। सरकार द्वारा जनता का मनोबल बनाए रखने के लिए ऊंची ग्रोथ रेट के झूठ का प्रसार किया जा रहा है। यह भी बता दें कि वर्तमान महंगाई मुख्यत: दालों में है। यह विशेष क्षेत्र की समस्या है। मूल रूप से महंगाई नियंत्रण में है। 1वर्तमान सुस्ती से निकल कर अर्थव्यवस्था को तीव्र ग्रोथ के रास्ते लाने के लिए जरूरी है कि हाईवे, सोलर ऊर्जा संयत्र, बुलेट ट्रेन, डिजिटल गवर्नेस आदि क्षेत्रों में निवेश में भारी वृद्धि की जाए। जैसे घर के सामान्य स्थिति से आगे बढ़ने के लिए स्पोर्ट्स, योग क्लास, ट्यूटोरियल आदि की व्यवस्था करनी होती है। राजग सरकार के सामने समस्या है कि हाईवे आदि में निवेश करने के लिए रकम कहां से हासिल की जाए? नोट छापने से महंगाई बढ़ेगी और जनता विमुख होगी। ऋण लेने से घरेलू अर्थव्यवस्था में ब्याज दर में वृद्धि होगी और निजी उद्यमियों के लिए निवेश करना कठिन हो जाएगा। इस परिस्थिति में सरकार विदेशी निजी पूंजी का सहारा लेने का प्रयास कर रही है। मेक इन इंडिया योजना के अंतर्गत विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, परंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंद होने के कारण बड़े पैमाने पर विदेशी कंपनियां नहीं आ रही है। तमाम अध्ययन बताते हैं कि घरेलू निवेश तेज गति से हो रहा हो तो पीछे-पीछे विदेशी निवेश भी आता है। घरेलू निवेश सुस्त हो तो विदेशी निवेश भी सहम जाता है, जैसे बेटा पढ़ने में अव्वल हो तो मास्टरजी को ट्यूशन सहज ही मिल जाते हैं, परंतु बेटा बुद्धू हो तो मास्टरजी के ट्यूशन पर भरोसा नहीं बैठता है। राजग सरकार के कार्यकाल में ग्रोथ दबी हुई है, क्योंकि सरकारी निवेश ठंडा है। भ्रष्टाचार एवं फिजूलखर्ची पर नियंत्रण से महंगाई से राहत मिली है, परंतु ग्रोथ बढ़ाने के लिए टॉनिक नदारद है।1इस परिस्थिति से निकलने के लिए सरकार को विदेशी ऋण का सहारा लेना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक अथवा निजी बैंकों से ऋण लेकर हाईवे बनाने चाहिए। ऋण लेकर निवेश करने से महंगाई तथा ब्याज दर नहीं बढ़ेगी। जैसे सरकार ने 1000 करोड़ का ऋण लेकर बुलेट ट्रेन बनाई। सीमेंट, लोहा, इंजन और कोच, सभी का आयात कर लिया। ऐसे में घरेलू अर्थव्यवस्था में सीमेंट आदि की डिमांड एवं सप्लाई पूर्ववत बनी रहेगी। इसे ऐसे समङों कि ऋण लेकर नया फ्रिज खरीद लेने से घर का बजट पूर्ववत बना रहता है। फ्रिज में सब्जी की बर्बादी कम होने से बची रकम से फ्रिज का रीपेमेंट भी हो जाता है।1राजग सरकार के सामने गंभीर चुनौती है। जनता ने बड़ी आशा से उसे सत्ता पर पूर्ण बहुमत देकर बैठाया है, लेकिन निवेश के अभाव में लोगों के चेहरों में दिनोदिन मायूसी बढ़ रही है। सरकार को चाहिए कि इस गहराते अंधेरे को तत्काल तोड़े। विदेशों से निजी निवेश नहीं आएगा, क्योंकि घरेलू अर्थव्यवस्था में मंदी है। इसलिए सरकार को विदेशी ऋण लेकर भारी मात्र में निवेश करना चाहिए। राजग के ईमानदार मंत्री इस कार्य को बखूबी संपन्न कर सकते है। तब हम न्यून महंगाई तथा तीव्र ग्रोथ के रास्ते पर चल निकलेंगे।
 

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