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Spiritual | 9-Dec-2016 08:56:52 PM
मोक्षदा एकादशी 10 दिसंबर को, मनेगी गीता जयंती

  • पित्रों को मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी से शुरू करें गीता पाठ



 

दि राइजिंग न्‍यूज

मोक्षदा एकादशी 10 दिसंबर को है। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने से नरक में गए पितरों को मुक्ति मिलती है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाली भगवद्गीता का उपदेश दिया था। तभी से इस तिथि का नाम गीता जयंती हो गया। असल में मनुष्य जीवन केवल भोग और विलास हेतु नहीं है। इसका परम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना ही है। हमें सदैव भक्ति और सेवा में समय लगाना चाहिए। सत्य, दया और प्रेम को अपने जीवन में उतारने वाला ही मोक्ष प्राप्त करता है। इन तीनों के रहने से ही धर्म फलता-फूलता है। देखा जाए तो पंचम वेद माने जाने वाले महाभारत में विद्यमान गीता को हर दिन अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। बच्चों को तो बचपन से ही इसे पढ़ाना चाहिए।

श्रीहरि के नाम का कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण

यह एकादशी पापों को हर लेने वाली होती है। इस एकादशी के बारे में कहा गया है कि मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी की दोपहर में जौ की रोटी और मूंग की दाल का एक बार भोजन करने के बाद एकादशी को प्रात: स्नान करके उपवास रखना चाहिए। इस व्रत की महिमा के बारे में धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि इस दिन तुलसी के साथ भगवान दामोदर की धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए। इस दिन व्रत करने से दुर्लभ मोक्ष पद की प्राप्ति होती है। मोक्षदा एकादशी की रात में श्रीहरि के नाम का कीर्तन करते हुए रात्रि में जागरण करना चाहिए।

माक्षदा एकादशी की कथा

इसकी एक कथा प्रचलित है- पूर्व काल में चंपक नगर के राजा वैखानस ने एक रात सपने में अपने पितरों को नरक में देखा, जो उनसे उन्हें नरक से मुक्ति दिलाने को कह रहे थे। तब राजा पर्वत मुनि से मिले और उनके निर्देश पर पितरों की मुक्ति के उद्देश्य से इस एकादशी का विधि-विधान से व्रत किया और व्रत का फल अपने पितरों को प्रदान किया, जिससे उनके पितरों को नरक से मुक्ति मिली। इस एकादशी की कथा पढ़ने-सुनने से यज्ञ का फल मिलता है। समय हो और शरीर निरोगी हो तो इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करना चाहिए, अन्यथा महाभारत ग्रंथ का पाठ करें। गीता पाठ से निश्चित ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होगा। वे लोग तो जरूर गीता पाठ करें, जो शनि की साढ़े साती और ढैया से परेशान हैं। श्री दामोदर को प्रसाद रूप में तुलसी और मिश्री का भोग लगाएं।

 

 

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