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Ladies Special | 17-Jul-2016 03:15:50 PM
आधुनिक जीवनशैली से 20 फीसद महिलाएं बीमार

   -महिलाओं में अंत:स्रावी ग्रंथियों की बीमारी बढ़ी

   -इंसुलिन का स्तर बहुत अधिक होने से पाचन तंत्र पर असर



 


दि राइजिंग न्‍यूज ब्‍यूरो

महिलाओं में होने वाली बीमारी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) अब केवल प्रजनन संबंधी बीमारी नहीं है। इसका संबंध शरीर की अंत:स्रावी ग्रंथियों और पाचन तंत्र से भी है। यह बीमारी अब आम है। साथ ही इसके कारण व नतीजों को लेकर आए दिन नए तथ्य समाने आ रहे हैं, जिससे मरीज में ही नहीं डॉक्टरों में भी भ्रम की स्थिति है। लेकिन इतना वे मानते हैं कि आधुनिक जीवनशैली महिलाओें को बहुत बीमार कर रही है।



इस बीमारी को लेकर देश भर में कोई एक सत्यापित रिपोर्ट नहीं है। इसलिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) को इस पर राष्ट्रीय स्तर पर शोध का प्रस्ताव दिया गया गया है, ताकि देशव्यापी स्तर पर स्थिति साफ हो सके। इसको लेकर सही ढंग से जांच व इलाज का प्रोटोकाल अपनाया जा सके। पीसीओएस महिलाओं में होने वाली हार्मोन संबंधी गड़बड़ी वाली बीमारी है। पहले इसे केवल प्रजनन संबंधी विकार माना जाता था। नए वैज्ञानिक तथ्यों से पता चला है कि यह मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से भी संबंधित जीवन शैली से जुड़ी बीमारी है। पहले इसमें इंसुलिन का स्तर बहुत अधिक बढ़ा होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है खून में इंसुलिन की मात्रा कम होने लगती है और मरीज को मधुमेह हो जाता है।



यह होती हैं अंतःस्रावी ग्रंथियां

इन अंतःस्रावी ग्रंथियों को पहले एक-दूसरे से पृथक् समझा जाता था, किंतु अब ज्ञात हुआ है कि ये सब एक-दूसरे से संबद्ध हैं और पीयूषिका ग्रंथि तथा मस्तिष्क का मैलेमस भाग उनका संबंध स्थापित करते हैं। मस्तिष्क ही अंतःस्रावी तंत्र का केंद्र है। शरीर में मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियां हैं पीयूषिका (पिट्यूटैरी), अधिवृक्क (ऐड्रोनल), अवटुका (थाइरॉइड), उपावटुका (पैराथाइरॉयड), अंडग्रंथि (टेस्टीज), डिंबग्रंथि (ओवैरी), पिनियल, लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ और थाइमस। हार्मोन मानव शरीर की अंत:स्रावी ग्रंथियां विभिन्न प्रकार के उद्दीपन में ऐसे पदार्थों का स्राव करती हैं जिनसे शरीर में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं।



मधुमेह ही नहीं बल्कि कई मामलों में कोलेस्ट्रॉल संबंधी दिक्कतें व हृदय रोग के अलावा मरीज को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी तक हो जाती है। महिलाओं की ओवरी (अंडाशय में) में सिस्ट या रसौली होना आम बात है। दुनिया भर में चार से दस फीसद महिलाएं इससे पीड़ित हैं, वहीं यूपी में करीब 20 फीसद महिलाएं पीसीओएस का शिकार हैं।



चिकित्‍सा विशेषज्ञों का कहना है

बढ़ती उम्र में शरीर में होने वाले हार्मोन संबंधी बदलाव में भी सिस्ट हो जाते हैं। केवल सिस्ट होने से दिक्कत नहीं होती, लेकिन अगर इसके साथ और दिक्कते हैं तो उसका समुचित इलाज व प्रबंधन जरूरी है। कम से कम तीन लक्षण या व्यापक जांच के बाद ही इलाज की रणनीति बनाई जानी चाहिए।



के डॉ. एसके मिश्रा, एंडोक्राइनोलॉजी, पीजीआइ लखनऊ

इस बीमारी में माहवारी में अनियमितता, भारी रक्तस्राव, मोटापा, गर्दन व त्वचा पर काले निशान, शरीर पर बाल और बांझपन जैसे लक्षण आम हैं। भारत में हर चौथी-पांचवीं महिला इस बीमारी से पीड़ित है। इस दिशा में हुए अध्ययन बताते हैं कि जिसे पीसीओएस है उसे या उसके मां-बाप को मधुमेह, उच्च रक्तचाप या ऐसी ही कोई दूसरी दिक्कत जरूर रही होगी। सिस्ट के मरीजों की मधुमेह हार्मोन की जांच, फैटी लिवर का पता लगाने के लिए लिवर की जांच (अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एमआरआइ) करके ही आगे इलाज की रणनीति बनानी चाहिए।



अभी तक इस बीमारी की जांच को लेकर कोई तय दिशा निर्देश नहीं है। कुछ हार्मोन जांच व अल्ट्रासाउंड के आधार पर ही इलाज होता है। नए तथ्‍य रोज सामने आ रहे हैं।



डॉ देव, रेडियोलाजी विभाग, पीजीआइ

नए वैज्ञानिक तथ्यों से पता चला है कि यह मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से भी संबंधित जीवन शैली से जुड़ी बीमारी है। पहले इसमें इंसुलिन का स्तर बहुत अधिक बढ़ा होता है। फिर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है खून में इंसुलिन की मात्रा कम होने लगती है और मरीज को मधुमेह हो जाता है।


डॉ एन अग्रवाल, महिला व प्रसूति विभाग, एम्‍स 

 

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