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देश में नहीं बना मनमाफिक कानून

  • कैलाश सत्यार्थी ने कहा शिक्षा जरूरी
  • दुनिया के 130 देशों ने बालश्रम कानून का माना


 

दि राइजिंग न्‍यूज

अनुराग शुक्ल

30 जुलाई, लखनऊ।

शांति के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर देश का मान बढ़ाने वाले समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी गरीबों और मजलूमों की आवाज बन चुके हैं। देश में ही नहीं‍ दुनिया के कई देशों में बालश्रम में लगे बच्चों के‍ लिए काम कर रहें हैं। वे उनकी आवाज हैं। 1990 में यूनाइटेड नेशन ने बालश्रम पर काननू बनाया। जिसके तहत उन्‍होंने 1998 में 103 देशों का चक्कर लगाया। सभी देशों में मजबूत कानून बना। लेकिन भारत का कानून मजबूत कानून नहीं बना। सरकार ने बातें नहीं मानी। कैलाश ने सरकार की नहीं सुनी। अन्यथा देश से पूरी तरह बालश्रम पर रोक लग जाती। तब आज जितने पापड़ सरकार बेल रही है न बेलनी पड़ती। समाज के ऐसे वाहक और श्रम कानूनों के पुरोधा डा. कैलाश सत्‍यार्थी से बालश्रम को लेकर खरी-खरी बात की। राजधानी में डा. एपीजे अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि पर आयोजित इंटरनेशनल यूथ कॉनक्लेव में शामिल कैलाश सत्‍यार्थी ने स्वीकारा कि देश में ठोस श्रम कानून की जरूरत है।


देश में क्यों नहीं बन पाया बालश्रम पर मजबूत कानून ?

दुनियाभर के 103 देशों में बालश्रम पर मजबू्त कानून है। मैने सरकार को ठोस कानून बनाने को कहा था। सकारात्मक बातें हुईं थी, लेकिन मेरे मनमाफिक कानून नहीं बनाया जा सका। अफसोस है कि दुनियाभर के लोग बालश्रम पर गंभीर है जबकि देश में कानून होते हुए भी बालश्रम से मुक्ति नहीं पायी जा सकी है। कानून तो दूर सरकार शिक्षा पर काननू देने में लचर रही है। शिक्षा ही हर इसकी कुंजी है जिससे मुश्किलें दूर हो सकती है पर भारत में यह भी न हो सका।


दुनिया के अन्य देशों में बाल श्रम कानूनों की क्या स्थिति है ?

बाल श्रम पर खासकर दक्षिण अफ्रीकी देशों में बहुत काम करने की जरूरत है। गरीबी जहां रहेगी वहां बालश्रम खूब पनपेगा। कैलाश बताते हैं कि, एक देश में गया। वहां बच्चे बीन्स को अलग कर रहे थे। उनसे जब पूछा कि चाकलेट खाएंगे तो बच्चों ने कहा ‍कि यह क्या चीज है। स्थिति बहुत खराब है। दुनियाभर में अन्याय के खिलाफ काम करना होगा। समानता के लिए सभी को आगे आना होगा तभी कुछ हो पाएगा।


यह कैसे होगा ? सरकारें आपके अनुसार काम नहीं करतीं

युवा वर्ग को ‍जिम्मेदारी उठानी होगी। बड़े सपने देखने होंगे। 36 साल से संघर्ष कर रहा हूं। आज भी सफलता नहीं मिली। अपने देश में ही बाल मजदूरी पूरी तरह बंद नहीं हो पायी। हमारे ऊपर तो नोबेल के बाद दुनिया में बालश्रम व शांति की जिम्मेदारी है। प्रयास कर रहा हूं और युवा वर्ग लीडर बनकर जब बालश्रम के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर देंगे तब समस्या दूर हो जाएगी।


सीरिया में तो हालात बहुत खराब हैं ?

वहां पर तो बालश्रम के साथ ही बच्चियों का खूब शोषण हो रहा है। बताने लगे ‍कि एक सि‍गरेट की कीमत से भी कम पर 12 साल की लड़कियों को बेच दिया जाता है। अब बताइये जहां हमारी बच्चियां इस कदर जुल्म सह रही हैं। इसे खत्म करने के लिए युवा वर्ग को जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम करना होगा।


कैसे शुरू हुआ संघर्ष ? क्‍या देखकर बालश्रम से जुड़े

विदिशा के एक गांव में 1964 में पैदा हुआ। प्राथमिक शिक्षा दुर्गा पाठशाला से शिक्षा प्राप्त करके इलेट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। कुछ दिन शिक्षण का कार्य किया। फिर नौकरी छोड़ दी और 1980 में ‍दिल्ली चला गया। वहां पर अपनी आवाज पहुंचाने के लिए पत्रिका निकाली फिर संघर्ष शुरू किया। फिर बचपन बचाओ आंदोलन की शुरुआत की। क्‍योंकि, अपने कार्य के दौरान बच्‍चों पर होने वाले बेइंतहा जुल्‍म को नजदीक से देखा। बच्‍चों को बीड़ी कारखानों में बंधक बनते देखा। उनकी पीड़ा समझ में आयी। धरातल पर काम करने को उतर पड़ा।


क्या मुश्किलें आई और कहां-कहां काम ‍किया ?

जब बाल मजदूरी के खिलाफ जंग शुरू किया तो हर स्थान पर जाता था। जहां पता चलता कि बालश्रम हो रहा है, वहां पहुंच जाता। बच्चों को छुड़ाता। ‍उनको नया जीवन देने का प्रयास किया गया। यूपी के मिर्जापुर, भदोही, बनारस, मऊ ‍आदि शहरों में बालश्रम पर बहुत काम किया और लोगों को मुझसे भय हो गया था। कई बार हमला हुआ। लेकिन मन में ठान लिया था ‍कि बचपन बचाना है।


यूपी में काम करने में कितनी परेशानी, खासकर प्रशासन स्‍तर पर?

यूपी में बालश्रम कानूनों का मजाक बना हुआ है। पुलिस और प्रशासन इस ओर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। बालश्रम से जुड़़े मामलों को लेकर पुलिस के पास जाने पर उनका समय नहीं मिलता। दरअसल वे इसको समझते भी नहीं हैं। लिहाजा यूपी में सबसे अधिक परेशानियां झेलनी पड़ी हैं।


अभियान यूपी से क्यों शुरू कर रहे हैं, आप तो मध्य प्रदेश के हैं और वहां से करते तो ज्यादा अच्छा होता ?

यूपी भी मेरे घर जैसा है। यहां पर युवा मुख्यमंत्री हैं और उनकी पत्नी सांसद डिंपल यादव हैं। डिंपल को बच्चों की आवाज बनाना चाहता हूं। निश्चित रूप में वह बच्चों की आवाज बनेंगी और लीडर की तरह नेतृत्व करेंगी। इसके साथ ही हर घर-घर से लीडर पैदा करना पड़ेगा तभी बच्चों को स्कूलों में भेजा जा सकेगा। सीएम अगर चाह लें तो काम करने में आसानी होगी।


घर जैसा कैसे, आप के जीवन में लखनऊ का कोई कनेक्शन है ?

अरे भाई लखनऊ से बहुत खास रिश्ता है। मेरी पत्नी सुमेधा यहां पैदा हुई हैं। देश की पहली नोबेल पत्नी हैं। मेरा सौभाग्य है ‍कि इस शहर में पैदा होने वाली सुमेधा मेरी जीवन संगिनी बनी।


20 करोड़ बच्चे शिक्षा से वंचित है ? यूपी में भी हाल अच्‍छे नहीं हैं

कहतें हैं कि दुनिया में 20 करोड़ बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पा रही है। वे शिक्षा से वंचित हैं। इसकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इसे रोकने के लिए यूपी से मुहिम की शुरुआत करेंगे। क्‍योंकि, यूपी में 1.90 करोड़ बच्‍चे अब भी स्‍कूलों से दूर हैं।


नोबेल का क्या अनुभव रहा ?

यूनाइटेड नेशन में जब नोबेल के लिए गया तो लगा कि, मेरा काम दुनिया को पसंद आ रहा है। जीवन का संघर्ष स्मृमियों में आ गया। वहां पर सभी ने मेरे काम को सराहा। तकलीफ एक बात की है कि महात्मा गांधी को नोबेल नहीं दिया गया। अगर उनको मिलता तो ज्यादा खुशी होती।


भारत में‍ स्थिति कैसे सुधरेगी ? क्‍या करना होगा

शिक्षा सभी अधिकारों की कुंजी है। जब बाल वर्ग शिक्षित हो जाएगा तब सारी मुश्किलें अपने आप ही दूर हो जाएंगी। वंचित बच्चों को स्कूल भेजना होगा। यही काम हो जाता तो दूर हो जाती मुश्किलें।


आपको लगता है कि भारत में आवाज सुनी जाएगी ?

मुश्किल है। आसान तो नहीं होगा पर प्रयास कर रहे हैं। समस्‍या यह है कि सरकारों के बदलने से आने वाली सरकार पहले की बात नहीं मानती लिहाजा 60 सालों से हालात में सुधार नहीं हो पा रहा है। आगे भी समय लगेगा।

 

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