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हम डुगडुगी बजाकर नाटक करते थे



 

दि राइजिंग न्‍यूज

अभिनेता व कॉमेडियन राजपाल यादव ने भले ही कितनी ऊंचाईयां प्राप्‍त कर ली हों, लेकिन वह खुद को एक साधारण व्‍यक्ति ही मानते हैं। राजपाल बीते दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि जब वह एनएसडी में थे तब प्रैक्टिस करते हुए रात के तीन बज जाते थे। प्रैक्टिस खत्म होने के बाद जोरों की भूख लगती थी। ऐसे में पैरों में होती थीं चप्पलें और एनएसडी से हम सारे साथी अपने ड्रामे के काले-काले चोगों में परांठे खाने के लिए आइटीओ पर आया करते थे।

बकौल राजपाल, मैंने सेवन स्टार होटल का लाइफस्टाइल भी जी लिया, लेकिन आजतक भी उन परांठों को नहीं भूल पाया हूं। उस वक्त कड़ाके की ठंड में गर्मागर्म परांठे खाकर तबीयत खुश हो जाया करती थी। यही वजह है कि मैं आजतक उस टेस्ट को नहीं भुला पाया हूं। परांठे खाने के बाद हम चार बजे सुबह सोया करते थे और सुबह आठ बजे उठकर बरमूडा में इंडिया गेट पर जॉगिंग किया करते थे। 



लाजवाब था एनएसडी 

राजपाल को एनएसडी में बिताए अपने दिन अभी भी याद हैं। वह बताते हैं, अगर आपने एनएसडी में तीन साल नहीं बिताए हैं, तो आप उसे समझ ही नहीं सकते, जहां पूरे देश भर के स्टूडेंट्स आते हैं। वहां पर क्रिएटिविटी की कोई लिमिट नहीं है। आप जो चाहें वह कीजिए। और तो और आपको अपने प्रोडक्शन के लिए जिंदा सांप भी उपलब्ध हो जाएगा। आप चाहो तो खुद को 24 में से 36 घंटे बिजी रख सकते हो और चाहो तो पूरे के पूरे 24 घंटे सोकर भी बिता सकते हो, क्योंकि वहां पर कोई आपको रोकने-टोकने वाला नहीं होता। बेशक, ऐसी ही लाइफ में आपकी क्रिएटिविटी निकलकर सही मायनों में सामने आती है। मेरा मानना है कि कोई इंस्टिट्यूट या दीवारें कुछ बनाती नहीं हैं। बल्कि आपने भीतर कुछ होता है और वह उसे तराशता है। 



टेस्ट मैच थी यह फिल्म 

अपनी फिल्म भोपाल: अ प्रेयर फॉर रेन के बारे में पूछने पर राजपाल बताते हैं, हरेक क्रिकेटर की इच्छा होती है कि वह 20-20 खेले, वन डे खेले, लेकिन उसे असली खुशी तब होती है, जब वह टेस्ट क्रिकेट के लिए सिलेक्ट होता है और खेलता है। और अगर टेस्ट में उसे ओपनिंग करने का चांस मिल जाए, तो वह सोने पर सुहागा होता है। माना कि मुझे इंडस्ट्री में कॉमिडी ऐक्टर के तौर पर ज्यादा सफलता मिली है और मैंने ऐसी फिल्में की भी खूब हैं। लेकिन भोपाल: अ प्रेयर फॉर रेन ने मुझे अपने भीतर के ऐक्टर को साबित करने का चांस दिया और इसके हॉलिवुड फिल्म होने की वजह से मेरी ऐक्टिंग को विदेशों तक में पसंद किया गया। वरना अभी तक मैं कॉमिडी ऐक्टर के तौर पर ही स्थापित था। जब इस फिल्म को अमेरिका में दिखाया गया, तो सबने स्टैंडिंग ओवेशन दिया। इसके बाद मुझे लगा कि अब मेरा स्ट्रगल वाला फेज खत्म हो गया और अब मैं बढ़िया सिनेमा पर फोकस कर सकता हूं। 

 

हर मंच का मजा लिया 

मेरी शुरुआत बहुत छोटे लेवल पर हुई थी। कचहरी के बाहर हम डुगडुगी बजाते थे। जैसे ही 200 लोग इकट्ठे हुए, तो नाटक शुरू हुआ बिजली-पानी की कमी के खिलाफ पर्दाफाश। उसके बाद थिएटर शुरू किया और फिर टीवी से होते हुए फिल्मों की दुनिया में आ गए। इस तरह मैंने हर मंच का मजा लिया। शायद यही वजह थी कि मैं भोपाल: अ प्रेयर फॉर रेन में दिलीप के रोल को इतने अच्छे से निभा पाया। जब मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं रिलीज हुई थी, तभी मेरे पास लंदन से इसके डायरेक्टर रवि कुमार का फोन आया। उन्होंने मुझे भोपाल ट्रैजेडी पर फिल्म करने का ऑफर दिया। मुझे स्क्रिप्ट पसंद आई और मैंने फिल्म साइन कर ली। फिल्म का सबसे मजेदार हिस्सा यह था कि सेट पर हमेशा इंडियन कास्ट के साथ गोरे भी रहा करते थे। इसलिए ऐसा लगता था कि मानों हम ग्लोबल विलेज में हों।

 

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